नई दिल्ली:
सुप्रीम कोर्ट में आवारा कुत्तों से जुड़े मामलों की सुनवाई एक बार फिर शुरू हो गई है। जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ इस अहम मुद्दे पर सभी पक्षों की दलीलें सुन रही है। सुनवाई के दौरान आज कई दिलचस्प और गंभीर तर्क सामने आए।
वरिष्ठ अधिवक्ता सीयू सिंह ने अदालत में कहा कि अगर आवारा कुत्तों को अचानक बड़ी संख्या में हटाया गया, तो इससे चूहों की आबादी तेजी से बढ़ सकती है। उन्होंने तर्क दिया कि चूहे कई गंभीर बीमारियों के वाहक होते हैं और कुत्ते प्राकृतिक रूप से संतुलन बनाए रखने में भूमिका निभाते हैं।
अदालत इस मामले में डॉग लवर्स, कुत्तों के काटने के शिकार लोगों और पशु अधिकार कार्यकर्ताओं की ओर से पेश वकीलों की दलीलों को विस्तार से सुन रही है।
राज्यों के हलफनामे पर अपडेट
एमिकस क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि अब तक 16 राज्यों ने अपने हलफनामे दाखिल कर दिए हैं, जबकि 7 राज्यों की ओर से अब भी जवाब आना बाकी है। उन्होंने कहा कि जल्द ही एक संशोधित नोट भी कोर्ट में पेश किया जाएगा।
नसबंदी ही कारगर उपाय?
सीयू सिंह ने एनिमल वेलफेयर बोर्ड के SOP को लेकर कहा कि चार बड़े राज्यों ने इस पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई हैं। उन्होंने यह भी बताया कि दिल्ली जैसे शहरों में चूहों और बंदरों का खतरा पहले से मौजूद है। ऐसे में कुत्तों को अचानक हटाने से स्थिति और बिगड़ सकती है।
जस्टिस संदीप मेहता ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में टिप्पणी करते हुए कहा कि चूहे बिल्लियों के दुश्मन होते हैं और शायद बिल्लियों की संख्या बढ़ाना भी एक समाधान हो सकता है। हालांकि उन्होंने साफ किया कि कोर्ट ने सभी कुत्तों को सड़कों से हटाने का कोई निर्देश नहीं दिया है, बल्कि नियमों के तहत मानवीय व्यवहार पर ज़ोर दिया गया है।
सीयू सिंह ने कहा कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियम, यानी कुत्तों की नसबंदी कर उन्हें उसी इलाके में वापस छोड़ना, अब तक सबसे प्रभावी तरीका साबित हुआ है।
शेल्टर और बजट पर सवाल
वरिष्ठ अधिवक्ता कृष्णन वेणुगोपाल ने कहा कि अस्पतालों के वार्ड में कुत्तों की मौजूदगी स्वीकार्य नहीं है, लेकिन समस्या यह है कि अब तक वैधानिक नियमों को लागू करने की इच्छाशक्ति नहीं दिखाई गई। उन्होंने बताया कि प्रस्तावित शेल्टर मॉडल पर करीब 26,800 करोड़ रुपये का खर्च आ सकता है और इसके लिए 91,800 नए शेल्टर बनाने होंगे।
उन्होंने सुझाव दिया कि हर जिले में एक एनिमल बर्थ कंट्रोल सेंटर बनाया जाए, जिसकी अनुमानित लागत करीब 1,600 करोड़ रुपये होगी। इसके लिए केंद्र सरकार के कई मंत्रालयों को मिलकर काम करना होगा और एक सिंगल नोडल एजेंसी बनाई जानी चाहिए।
बड़ी चुनौती: संसाधन और प्रशिक्षण
कोर्ट को बताया गया कि फिलहाल देश में केवल 66 मान्यता प्राप्त ABC सेंटर हैं, जबकि भारत में करीब 5.2 करोड़ आवारा कुत्ते हैं। इतनी बड़ी आबादी को नियंत्रित करने के लिए मैनपावर, प्रशिक्षण और इंफ्रास्ट्रक्चर की भारी कमी है।
वरिष्ठ वकील ने यह भी कहा कि एक कुत्ते की नसबंदी पर निजी तौर पर 10,000 रुपये से ज्यादा खर्च आता है। बड़े पैमाने पर नसबंदी के लिए पशु चिकित्सकों को प्रशिक्षित करना होगा, लेकिन इसके लिए पर्याप्त ट्रेनिंग सेंटर भी मौजूद नहीं हैं।
सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि जैसे कोविड महामारी के समय केंद्र और राज्य सरकारों ने मिलकर हालात संभाले थे, वैसे ही आवारा कुत्तों की समस्या से निपटने के लिए भी समन्वित प्रयास किए जा सकते हैं।























