अरावली पहाड़ियों को लेकर देशभर में चल रही चर्चाओं और आशंकाओं के बीच केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने स्थिति स्पष्ट कर दी है। उन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि अरावली क्षेत्र में किसी भी प्रकार की छूट नहीं दी गई है और न ही भविष्य में दी जाएगी। सरकार अरावली पर्वतमाला के संरक्षण के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
ANI को दिए इंटरव्यू में केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है और सरकार का लक्ष्य इसे हरित, सुरक्षित और संरक्षित बनाए रखना है। उन्होंने कहा कि अरावली के संरक्षण को लेकर ग्रीन अरावली वॉल आंदोलन शुरू किया गया है, जिसकी सराहना भी की जा रही है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को लेकर फैलाया जा रहा भ्रम
भूपेंद्र यादव ने कहा कि अरावली रेंज की परिभाषा को लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखा गया था। कोर्ट ने अपने फैसले में दो महत्वपूर्ण बातें कही हैं, लेकिन दुर्भाग्यवश उन्हें गलत तरीके से पेश किया जा रहा है।
उन्होंने बताया कि भूविज्ञान के वैश्विक मानकों के अनुसार, प्रसिद्ध भूवैज्ञानिक रिचर्ड मर्फी की परिभाषा के तहत 100 मीटर ऊंचाई वाली संरचना को पहाड़ माना जाता है। इसका अर्थ केवल ऊंचाई तक सीमित नहीं है, बल्कि पहाड़ की चोटी से लेकर जमीन तक पूरे 100 मीटर क्षेत्र को सुरक्षा के दायरे में माना जाता है, जिससे लगभग 90 प्रतिशत अरावली क्षेत्र संरक्षित रहता है।
परिभाषा के अभाव में हो रही थी अनियमितताएं
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अब तक अरावली क्षेत्र की स्पष्ट परिभाषा न होने के कारण खनन परमिट में कई तरह की अनियमितताएं सामने आती रही हैं। उन्होंने बताया कि अरावली क्षेत्र का करीब 58 प्रतिशत हिस्सा कृषि भूमि, जबकि कुछ हिस्सा गांवों, शहरों और बस्तियों का है। इसके अलावा लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र संरक्षित वन क्षेत्र के अंतर्गत आता है, जहां किसी भी प्रकार की गतिविधि की अनुमति नहीं है।
माइनिंग को लेकर सख्त रुख
माइनिंग लीज के सवाल पर भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि नई खनन गतिविधियों के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन अनिवार्य होगा। इसके तहत पहले वैज्ञानिक अध्ययन किया जाएगा, जिसमें ICFRE (भारतीय वन अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद) शामिल होगी। इसके बाद ही किसी प्रकार का निर्णय लिया जाएगा।
उन्होंने कहा कि अरावली क्षेत्र के 0.19 प्रतिशत से अधिक इलाके में खनन संभव नहीं होगा। जो खनन पहले से चल रहा था, उसी के आधार पर अनुमति दी जा रही थी, लेकिन वहां बड़े पैमाने पर अवैध खनन हो रहा था। अब प्रतिबंधित और वर्जित क्षेत्रों को स्पष्ट रूप से चिन्हित कर सख्त अनुपालन सुनिश्चित किया जाएगा।
केवल पेड़ नहीं, पूरी इकोलॉजी की सुरक्षा जरूरी
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि अरावली की सुरक्षा केवल पेड़ लगाने तक सीमित नहीं हो सकती। यह एक संपूर्ण इकोलॉजिकल सिस्टम है, जिसमें घास, झाड़ियां, औषधीय पौधे और वन्यजीव शामिल हैं। उन्होंने बताया कि मंत्रालय द्वारा गठित इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस भी इसी सोच पर आधारित है, क्योंकि किसी भी बड़े वन्यजीव का संरक्षण तभी संभव है जब पूरा पारिस्थितिकी तंत्र सुरक्षित हो।
उन्होंने बताया कि अब तक 29 से अधिक नर्सरी स्थापित की जा चुकी हैं और इन्हें अरावली क्षेत्र के हर जिले में फैलाने की योजना है। प्रत्येक जिले में स्थानीय वनस्पतियों का अध्ययन कर उसी के अनुरूप पौधारोपण किया जा रहा है।
शहरीकरण की कोई योजना नहीं
भूपेंद्र यादव ने स्पष्ट किया कि अरावली क्षेत्र में शहरीकरण की कोई नई योजना नहीं है। यह क्षेत्र सदियों से मानव बस्तियों का हिस्सा रहा है, लेकिन नई परिभाषा के आधार पर राज्यों को सख्त नियम बनाने होंगे। उन्होंने कहा कि अरावली के 90 प्रतिशत क्षेत्र में माइनिंग संभव नहीं है।
उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि राजसमंद और उदयपुर जैसे बड़े माइनिंग जिलों में भी औसतन एक प्रतिशत से कम, बल्कि केवल 0.1 प्रतिशत क्षेत्र में ही खनन की अनुमति संभव हो सकती है, वह भी तब जब राज्य सरकारें वैज्ञानिक योजना प्रस्तुत करें।
अवैध खनन पर पूरी तरह रोक
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री ने दो टूक कहा कि अवैध खनन पूरी तरह बंद किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सभी नियमों और कानूनों को केंद्र सरकार सख्ती से लागू करेगी।























